अतृप्त वासना का भंवर-4

(Atript Vasna Ka Bhanwar- Part 4)

सारिका कंवल 2019-02-14 Comments

This story is part of a series:

आपने अब तक की कहानी में पढ़ा था कि मैं सुखबीर के साथ सम्भोग करने में लगी थी.
अब आगे..

करीब 2 से 5 मिनट होने चले थे और सुखबीर के शरीर से पसीना बहने लगा था. मैं अपनी मस्ती में उसे और उकसाने का काम करने लगी थी. मैं कभी उसके चूतड़ों को पकड़ कर अपनी तरफ खींचती, तो कभी अपनी टांगें उसकी कमर पर लाद देती. उसने धक्कों की अपनी रफ्तार तेज कर दी और अब वो मेरी गहराई तक वार करने लगा. उसने मेरी कामोत्तजना इस प्रकार और अधिक बढ़ा दी क्योंकि अब उसका लिंग हर धक्के पर मेरी बच्चेदानी को चूम रही थी.

पर उसके इतने तेज़ और जोरदार धक्कों ने मेरे मन में भय ला दिया कि कहीं वो मुझसे पहले न झड़ जाए. अगर वो मुझसे पहले झड़ गया, तो मैं प्यासी रह जाऊंगी और कुछ पलों में मेरा ये भय सत्य हो गया. उसके लिंग ने एक तेज़ धार छोड़ दी, जो सीधा मेरी बच्चेदानी से जा टकराई. उस तेज़ वीर्य की चोट ने मुझे बता दिया कि सरदार जी अब झड़ गए.

मैं उसकी कमर को पकड़ कड़े शब्दों में बोल पड़ी- अभी नहीं …
पर अब बहुत देर हो चुकी थी, मेरे पूरे जोर के आगे भी वो नहीं रुका बल्कि 5-10 धक्के पूरी ताकत से मार अपनी थैली खाली करके मेरे ऊपर गिर गया. उसने अपना सारा वीर्य मेरी योनि के भीतर छोड़ दिया था, वो खलास हो गया था.

मुझे गुस्सा तो बहुत आया, पर मैं कर भी क्या सकती थी.

मैंने उसके सामान्य होने की प्रतीक्षा की. जैसे ही वो सामान्य हुआ, वो तुरंत उठ कर बैठ गया. मेरी योनि से लिंग के खींचते ही उसका वीर्य बह निकला था. उसने तुरंत तौलिया लिया और मेरी योनि साफ कर दी. फिर तौलिए का दूसरा किनारा लेकर अपने लिंग को पौंछने लगा. उसके चेहरे पर संतुष्टि के चिह्न दिख रहे थे, पर मुझे गुस्सा आने लगा था.

गुस्से में आकर मैंने उसे आखिर कर बोल ही दिया- बस इतना ही दम था.. फ़ोन पर तो बड़ी बड़ी बातें कर रहे थे?
उसका चेहरा मेरी बात सुनकर उतर गया और वो चुपचाप जमीन की तरफ देखने लगा. मैं उठकर बैठ गयी और अपनी योनि में तौलिया घुसा कर वीर्य पौंछने लगी.
तभी उसने डरते हुए मुझसे पूछा- क्या हुआ?
मैंने उससे कड़े शब्दों में कहा- हुआ क्या? आपकी मर्दानगी देख ली, एक औरत को संतुष्ट नहीं कर सकते और लंबी लंबी बातें करते हो.

उसका डर देख मुझे एक अलग तरह का मजा आ रहा था. आज से पहले मर्दों की मैंने सुनी थी और आज पहली बार कोई मर्द मेरी सुन रहा था.

एक तरह से ये पल मुझे ताकतवर होने का एहसास करा रहा था, जो मुझे अच्छा लग रहा था. वो खुद में बहुत शर्मिंदगी महसूस कर रहा था. पर मैं उसकी हालत समझ रही थी. फिर भी मैंने कोई दया नहीं दिखाई. मैं अपनी पैंटी पहन कर बोली- अब यहां से चलो.
उसने डरते हुए स्वर में कहा- कुछ देर और रुकते हैं.
मैंने कहा- अब क्या करना है, आपका दम तो सारा निकल गया?
उसने फिर डरते हुए स्वर में कहा- मैं किसी और तरीके से आपको खुश करना चाहता हूँ.

मैंने सोचा कि चलो देखते हैं कि अब क्या करेगा. फिर मैं उसके बगल में बैठ गयी.

उसने मुझसे कहा- आपकी योनि बहुत अच्छी है, कुछ देर और चाटना चाहता हूँ.
मैंने कुछ पल सोचा कि कम से कम ये चाट कर ही मुझे झड़ने में मदद करे, तो कुछ राहत मिले. तो मैंने उसकी बात मान ली और अपनी साड़ी कमर तक उठा कर पैंटी निकाल दी.

मैं लेट गयी और उसके लिए टांगें चौड़ी कर दीं. उसने भी बिना देरी के झुक कर मेरी योनि चाटनी शुरू कर दी. एक तो मैं पहले से इतनी उत्तेजित थी और जैसे ही उसके जीभ का स्पर्श मेरी योनि में पड़ा, तो ऐसा लगा कि जैसे खुद ही मेरी योनि का द्वार खुल गया.

उसने बड़े प्यार से मेरी योनि को चाटना शुरू कर दिया. मुझे बहुत आनन्द आने लगा और मैं और अधिक उत्तेजित होने लगी. वो बराबर दोनों तरफ की पंखुड़ियों को मुँह में भर बारी-बारी से चूसता और एक हाथ के अंगूठे से योनि के ऊपर के दाने को सहलाते जा रहा था.

थोड़ी देर में मुझे लगने लगा, जैसे सुखबीर अच्छे से समझ गया कि मुझे क्या चाहिए था. वो मुझे अपनी जुबान का जादू दिखाने लगा. थोड़ी देर के बाद वो मेरी योनि में दो उंगली डाल कर उसे तेज़ी से अन्दर बाहर करने लगा और जीभ मेरी दाने पर फिराने लगा.
अब तो मैं वासना के अंतिम छोर में पहुंच गई थी और रोके से भी मेरी सिसकारियां नहीं रुक रही थीं. मैं समझ नहीं पा रही थी कि उसे रोकूं या क्या करूँ. मैं मस्ती में आकर उसके बालों को पकड़ खींचने लगी, तो उसने और तेज़ी से उंगली अन्दर बार करनी शुरू कर दी. वो मेरे दाने को दांतों से दबाने लगा.

अब मुझे ऐसा लगने लगा कि मैं थोड़ी ही देर में अपना सारा पानी उड़ेल दूंगी. मैंने अपना सिर ऊपर उठा कर उसे देखना शुरू किया. इस वक्त मेरी सिस्कारियां रुकने का नाम नहीं ले रही थीं. मैंने गौर किया कि वो मेरी योनि से खेलने के साथ साथ बीच बीच में अपना लिंग भी पकड़ के सहलाता और हिला रहा था. मेरी उत्तेजना देख वो भी फिर से उत्तेजित होने लगा था.

अचानक मैंने महसूस किया कि अब मैं खुद को रोक नहीं पाऊंगी और पहले से कहीं ज्यादा ताकत से उसके बाल खींचने शुरू किए.

वो भी शायद समझ गया और उसने बिना रुके अपने हाथ को तेज़ी से आगे पीछे कर उंगली योनि में अन्दर बाहर करने लगा. उसने तभी एक उंगली से योनि की ऊपर की दीवार की तरफ रगड़ना शुरू किया और बस पल भर में ही मेरे सब्र का बांध टूट पड़ा.

मैंने तेज़ी से पिच पिच करके पानी की तेज़ धार उसके मुँह में ही छोड़ दी.
मैं शायद पहली बार ऐसे झड़ी होऊंगी, जिसमें इस तरह से मेरा पानी निकला होगा. मेरी योनि की मांसपेशियां सिकुड़ने लगीं और कड़क महसूस होने लगीं.

मैंने झड़ने के क्रम में मस्ती से अपनी दोनों टांगें चिपकाने की कोशिश की, पर उसने पूरी ताकत से अपने सिर और एक हाथ से मुझे रोक लिया. मैं कराहते सिसकते छटपटाने लगी, पर उसने भी कोई रहम नहीं दिखाया, मेरे पूरी तरह झड़ के शांत होने के बाद भी वो उंगली भीतर बाहर करता ही रहा.

कुछ पल के बाद मैंने उसे टटोलना शुरू किया, तो वो उठकर पलट गया. उसका लिंग मेरे मुँह के तरफ हो गया और उसका मुँह मेरी योनि की तरफ. हम दोनों करवट लेकर एक दूसरे के जननांगों के मुख दर्शित हो गए. मैंने उसके लिंग को देखा तो वो एकदम ढीला था. वो खुद अपने हाथ से उसे खड़ा करने की कोशिश कर रहा था, पर इतनी जल्दी उसका कैसे खड़ा होता.

मैंने उसके लिंग को हाथ से पकड़ हिलाना शुरू कर दिया और अपनी एक टांग सीधी रखी और दूसरी टांग उठा कर मोड़ दी. मेरी योनि उसके लिए खुल गयी और वो फिर से चाटने लगा. वो ज्यों ज्यों मेरी योनि को चूस रहा था, त्यों त्यों मेरी योनि से चिकनाई जैसी तरल जैली सी रिस रही थी. मैं फिर से गर्म और गीली होने लगी थी और अपनी उत्तेजना में उसके लिंग को बेरहमी से दबाने और जोर जोर से हिलाती गई.

मैं जब जब उसके अंडों, लिंग को जोर से दबाती या हिलाती, तो दर्द से सरदारजी कराह उठते और लिंग हल्के से जोर मार देता. जब जब उसका लिंग थोड़ा जोर मार उचकता, तो मेरी कामना जग जाती कि अब ये तैयार हो रहा.

पर शुरू के कुछ पल तो ऐसे हिचकी लेने जैसा उठता और फिर लटक जाता और मैं बुरी तरह से गर्म होकर व्याकुल हुए जा रही थी कि कब ये खड़ा होगा और मेरे भीतर आएगा.
मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करने लगी और सरदार जी भी जोर लगा लगा कोशिश करने लगे.

मैं बुरी तरह से उत्तेजित और कामुकता से भर गई थी, अब मुझसे बर्दाश्त करना असंभव हो रहा था. मैंने उसके लिंग की चमड़ी खोल कर पूरा खींचना शुरू कर दिया, सुपारे से लेकर नीचे तक का हिस्सा खोल दिया और ऊपर जीभ फिराने लगी. एक हाथ से मैंने उसके अंडों को हल्के हल्के सहलाना शुरू किया और दूसरे हाथ से लिंग को मुट्ठी में भर कर आगे पीछे करके सुपाड़े को चाटने लगी. कुछ क्षण चाटने, सहलाने और हिलाने से सरदारजी का लिंग थोड़ा थोड़ा कठोर होना शुरू हुआ. पर जिस तरह से वो मेरी योनि चाट रहा था, मैं जल्द ही दोबारा झड़ने की ओर अग्रसर थी.

हुआ भी कुछ ऐसा ही, उसने चाटने के साथ फिर से हाथ की दो उंगलियों को घुसा कर अन्दर बाहर करना शुरू कर दिया. जैसे ही उसने थोड़ी तेज़ी दिखाई, फिर से मेरे सब्र का बांध टूटने को हो चला.

मैं उत्तेजना में उसके अंडों को जोर से दबोच लिया और लिंग को मुँह में भर होंठों और दातों से काटने जैसा करने लगी. मेरी छटपटाहट शुरू हो गयी और मैं टांगें पटकने जैसे एक्शन करने लगीं. जिससे उसे मेरी योनि चाटने में परेशानी होने लगी.

तब उसने मेरी सीधी टांग को सिर के जोर से दबाया और दूसरी टांग को पकड़ अपने दूसरे हाथ के कांख में दबा कर जोर जोर से उंगली चलाने लगा. मैं मुँह में लिंग को दबाए ‘ह्म्म्म ह्म्म्म ह्म्म्म..’ करने लगी और झड़ने लगी.

मेरी योनि से चिपचिपा तरल, तेज़ी से रिसता देख सरदारजी का लिंग अकड़ने लगा. मैं महसूस करने लगी कि मेरे मुँह में उसका लिंग बड़ा हो रहा है और मैं झड़ने के जोर में दांतों और होंठों से ताकत से उसे दबाती चली गयी.

मैं मस्ती से इतनी भर गई कि झड़ते हुए मैंने उसके अंडों को कस के दबाए रखा और लिंग पर दांत गड़ाए रखे. मुझे इस बात की कोई चिंता नहीं थी कि सरदारजी को दर्द हो रहा है. मेरा मन केवल चरम सुख पर केंद्रित था. उस वक़्त सरदारजी का कराहना मेरे लिए कोई मायने नहीं रख रहा था.

सुखबीर को भी शायद ऐसा मौका पहली बार मिला था, इसलिए वो भी किसी तरह का विरोध नहीं जता रहा था.

मैंने दूसरी बार भी पानी छोड़ दिया और ढीली होने लगी, पर सरदार जी अभी भी उंगली से मेरी योनि भेदने में लगे हुए थे. सरदार जी का लिंग पूरी तरह कड़क हो चला था और मैं उसे अच्छे से चूसने लगी.

मैं चाह रही थी कि संभोग का एक दौर और चले, पर थोड़ा लंबा चले ताकि मैं भी चरम सुख का आनन्द ले सकूं.

थोड़ी देर चूसने के बाद मैंने सुखबीर से कहा- अब और भी कुछ करो.
वो एक आज्ञाकारी मनुष्य की तरह सटाक से उठा कर घुटनों के बल खड़ा हो गया. उसका लिंग तन कर सीधा मुझे देखने लगा. सुखबीर मेरी ही आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहा था.

मैं भी उठ कर घोड़ी की तरह झुक गयी और साड़ी उठा कर चूतड़ के ऊपर कर दिए और कहा- आ जाओ, आराम आराम से करना.. हड़बड़ी मत करना.
उसने हां में सिर हिलाया और मेरे पीछे आकर घुटनों के बल खड़ा हो गया. उसने मेरे चूतड़ों को फैलाया और लिंग पकड़ कर योनि का द्वार खोजना शुरू किया. कुछ पलों के बाद उसे रास्ता मिल गया और सुपाड़ा मेरी योनि के भीतर टिका कर मेरे दोनों चूतड़ों को पकड़ हल्के हल्के धकेलना शुरू किया. उसका लिंग कुछ ही पलों में पूरा मेरी योनि के भीतर चला गया, क्योंकि मेरी योनि पहले से बहुत गीली थी. उसने लिंग अन्दर बाहर कर संभोग शुरू किया तो उसके लिंग की घर्षण मेरी योनि में सुखद लगने लगा.
जिस प्रकार उसका लिंग मेरी योनि से रगड़ रहा था. उससे मुझे अंदाज हो गया था कि इस बार काफी देर तक संभोग करेगा. मुझे मेरी योनि में उसका लिंग फिसलता हुआ बहुत मजा दे रहा था और मैं उत्तेजना की शिखर पर बढ़ती हुई आगे चली जा रही थी.

मैं खुद में बहुत गर्म हो गयी थी और मन में लिंग योनि में घुसाता निकलता दिखने लगा था. मैं अब मादक सिसकियां लेने लगी थी और सरदारजी हांफने लगे थे.

कोई 10 से 15 मिनट तक सुखबीर मुझे धक्के मारता रहा. फिर एक पल आया जहां मैंने उसे उकसाया कि तेज धक्के मारे मुझे.. क्योंकि मैं अब फिर से झड़ने वाली थी. उसने मेरी बात सुन कुछ देर तो तेज़ धक्के रफ्तार से मारे, पर जल्द ही वो ढीला पड़ने लगा. मुझे उसके धक्कों में वो ताकत नहीं महसूस हो रही थी, जो इस वक़्त मुझे जरूरत थी.

उसके रुक रुक कर लगते हुए धक्के मुझे व्याकुल करने लगे थे और उसके लिंग में थकान की वजह से कड़कपन भी कम होने लगा था. मैं जितनी बार झड़ रही थी, उतनी मेरी जोरदार झड़ने की इच्छा बढ़ रही थी. मैं समझ गयी कि ये साथ नहीं दे पा रहा है, मेरी जरूरत के हिसाब से उसके धक्कों में दम नहीं लग रहा था.

मैंने तुरंत सुखबीर को कहा- आप लेट जाओ नीचे.
उसने बिना देरी किये लिंग खींचा और मेरे बगल में लेट गया. मैंने गौर किया कि उसका लिंग थोड़ा थोड़ा करके स्थूल हो रहा है. मैंने उसके लिंग को मुट्ठी में भर जोर जोर से 10 से 20 बार हिलाया. फिर साड़ी एक हाथ से समेट कर दोनों जांघें फैला उसके लिंग के ऊपर बैठ गयी.

लिंग को हिलाने से दोबारा कड़कपन आ गया था और सुखबीर थोड़ा सुस्ता भी चुका था. मैंने लिंग को पकड़ ऊपर की दिशा में सीधा किया और योनि की छेद सुपारे पर टिका कर बैठने लगी. मेरे हल्के दबाव से ही लिंग मेरी योनि में सरकता हुआ भीतर चला गया. मैंने दोनों हाथ उसकी छाती पर रखे और अपने चूतड़ उचकाने शुरू कर दिए. इस पोजीशन में बहुत मजा आने लगा था. अब तो ऐसा लग रहा था, जैसे सब कुछ मेरे बस में है. सुखबीर भी मेरे धक्कों से काफी उत्तेजित दिखने लगा था. वो बार बार मेरे चूतड़ या जांघों को सहलाने में लगा हुआ था. मैं तेज़ी के साथ धक्के लगा रही थी और उसके चेहरे पर कामुकता और चरम सुख की चाहत साफ झलक रही थी.

कुछ ही पलों में मैं फिर से झड़ गयी और तेज़ी उसके ऊपर गिर कर कमर से जोर लगा लगा अपनी योनि को उसके लिंग पर धकेलने लगी. सुखबीर और अधिक उत्तेजित हो गया और मेरे मांसल चूतड़ों को दोनों हाथों से पकड़ कर मसलने लगा. मैं झड़ कर थोड़ी ढीली हुई, पर मैंने धक्कों का सिलसिला जारी रखा. मेरा मन अब ऐसा हो रहा था कि ये संभोग की कड़ी कभी खत्म ही न हो.

शायद मैं बहुत दिनों के बाद संभोग कर रही थी, इसी वजह से मैं कुछ अधिक कामुक हो गयी थी. मेरे धक्कों में भले पहले की तरह ताकत न लग रही हो, पर मैं धक्के मारना छोड़ नहीं रही थी. मैं पसीने पसीने होने लगी थी और हांफने भी लगी थी. जांघों में अकड़न पैदा होने लगी थी और मैं अब केवल चूतड़ हिला पा रही थी.

उधर सुखबीर का लिंग मेरी योनि के भीतर जोर जोर के झटके मारने की तरह हो रहा था. उसके लिंग की नसों में दौड़ता हुआ खून मुझे महसूस होने लगा था और समझ गयी कि वो भी जल्द झड़ जाएगा.

हमें संभोग करते हुए आधे घंटे से अधिक हो गया था. अब मुझे उसके चेहरे पर व्याकुलता दिखाई देने लगी थी. उसे जिस तरह के धक्के चाहिए थे, वो मैं नहीं दे पा रही थी. जबकि मैं खुद फिर से उत्तेजित होकर तैयार हो गयी थी. पर उसकी मुझसे कुछ कहने की हिम्मत नहीं हो रही थी. शायद अभी भी वो डर रहा था.

मैंने कहा- अब आप ऊपर आओ.
इतना बोलकर मैं नीचे लेट गयी और जांघें फैला दीं. सुखबीर तुरंत मेरे ऊपर आकर अपना लिंग मेरी योनि में घुसा कर धक्के मारने लगा. उसके धक्के आराम आराम के थे, पर मुझे इस वक़्त तेज़ धक्कों की आवश्यकता थी.

मैंने उससे बोला- अब जल्दी जल्दी करो, तेज़ धक्के मारो.
उसे तो जैसे इसी बात की प्रतीक्षा थी. मेरी बात उसके कानों में पड़ते ही उसने पंखे की रफ्तार से धक्के देना शुरू कर दिए. मैं तो 2 मिनट के भीतर ही ‘हाय हाय.. उम्म्ह… अहह… हय… याह… ओह.. ओह..’ करती हुई झड़ने लगी. मैं मस्ती से भर गई और अपने चूतड़ उठाने लगी. उसे जहां तहा पकड़ कर अपना पूरा बदन मरोड़ने लगी. अपनी आंखों को मूंद कर होंठों को होंठों से दांतों से चबाने लगी.

मेरी ऐसी कामुक प्रतिक्रिया देख सरदारजी का सब्र टूट पड़ा और उन्होंने मेरी जांघें पकड़ सीधा घुटनों के बल खड़े होकर मुझे थोड़ा ऊपर उठा कर धक्के मारने शुरू कर दिए. वो एक तरफ तो तेज़ी से धक्के मार रहा था, दूसरी तरफ मेरी जांघों को पकड़ धक्के के साथ उठा कर मुझे खींचने लगा. सरदारजी ने मेरी मस्ती को दोगुनी कर दी और मैं काफी तीव्र चरम तक पहुंच गयी. मुझे ऐसा लगा कि मेरी योनि की मांसपेशियों पर मेरा वश नहीं रहा और अब पानी का फव्वारा सा छूट निकलेगा. वही हुआ.. मैंने एक तेज़ पिचकारी छोड़ दी.

बस फिर क्या था.. सरदारजी ने भी अपनी पिचकारी मार दी. हम दोनों पूरी ताकत से अपनी अपनी कमर एक दूसरे की तरफ धकेलने लगे. मेरी एक पिचकारी के बदले सरदारजी ने 3 पिचकारी मार दीं और हांफते हुए ढीले पड़ने लगे.

मैं भी झड़ कर संतुष्टि का अनुभव करते हुए सुस्ताने का प्रयास करने लगी. हम दोनों पसीने से लथपथ हांफते हुए एक दूसरे को संतुष्टि भरे भाव से देखते रहे.

सरदारजी का लिंग अभी तक मेरी योनि में था और मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कोई साँप दम तोड़ता है, वैसे ही अकड़न ढीली कर रहा. उसकी नसें झटके ले रही थीं और मैं साफ साफ उसके लिंग की नसों में रुक रुक कर बहता खून महसूस कर रही थी.

काफी देर तक उसके लिंग में नाड़ी की धड़कन सी महसूस होती रही, जो धीरे धीरे शांत हुई. शांत होते ही उसका लिंग सिकुड़ कर बाहर आ गया और उसके निकलते ही चिपचिपा पानी मेरी योनि से बह निकला, जिसमें सफेद वीर्य के हिस्से भी थे.

मैं अब पूरी तरह से सामान्य हो गयी थी और बहुत हल्का महसूस कर रही थी. मैंने तौलिये से योनि साफ की, कपड़े सही किये. उधर सरदारजी ने भी अपना पैंट पहन लिया और सब समेट कर चुपके से पहले बाहर झांक कर देखा कि कोई आसपास है तो नहीं, फिर हम वहां से निकल पड़े.

रास्ते भर में सुखबीर ने मुझसे केवल एक बात पूछी कि मजा आया या नहीं. पर मैंने कोई उत्तर नहीं दिया.

फिर वो मुझे स्टेशन के पास छोड़ चला गया. अंधेरा लगभग होने को था. मैं ऑटो पकड़ घर चली आयी. गरम पानी किया और नहा कर तैयार हो गयी. मेरे बदन में हल्का दर्द से था, पर मन में संतुष्टि थी. काफी दिनों के बाद अच्छा लग रहा था.

मेरी कहानी आपको कैसी लगी? आप मुझे मेल कर सकते हैं.
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