अतृप्त वासना का भंवर-3

(Atript Vasna Ka Bhanwar- Part 3)

सारिका कंवल 2019-02-13 Comments

This story is part of a series:

आपने अब तक की कहानी में पढ़ा था कि मेरी सहेली प्रीति के अपनी बहन के घर चले जाने के बाद से उसके पति सुखबीर ने मेरे जिस्म के ढके हुए हिस्सों को कामुकता से देखने के प्रयास तेज कर दिए थे.
अब आगे..

उस रात को मैं फिर अपने मित्रों और सहेलियों से ऑनलाइन बातें कर रही थी कि करीब 10 बजे सुखबीर का फ़ोन आया. मैं पहले तो चौंक गयी कि क्यों मुझे फ़ोन कर रहा. फिर सोचा कि कहीं कोई आपदा तो नहीं आई. इसी वजह मैंने फ़ोन उठा लिया.

फ़ोन उठाने पर उसने तो पहले मेरा हाल चाल पूछा, फिर बहाने से यह कहकर बात आगे बढ़ाने लगा कि मैं अकेली हूँ, सब ठीक ठाक है, वही सब पूछने को फ़ोन किया था.
मैंने सब उत्तर देने के बाद फ़ोन रखने की बात कही, पर उसने और बातें बनानी शुरू कर दीं. वो कहता रहा, मैं सुनती रही.

करीब एक घंटे तक उसने उस दिन बात की और मुझे सुबह दुकान पर दूध लेने आने का पूछा. मैंने उससे साफ कह दिया कि दुकान पर मुझे न टोकना, पता नहीं लोग क्या क्या सोचेंगे.
इस पर उसने मेरी बात को समझा और अगले दिन बस हाल चाल पूछ कर दूध देकर मुझे जाने दिया.

दोपहर उसने फिर फ़ोन किया और फिर से उसने इधर की बातों के साथ मेरे बारे में पूछताछ शुरू कर दी. उसके साथ काफी देर बातें करते करते मुझे भी वो अच्छा लगने लगा और करीब डेढ़ घंटे बातें हुई. रात में फिर से बात हुई और समय के बीतने के साथ साथ हम दोनों खुलने लगे.

ठंड का दिन था, तो थोड़ी बहुत उसने हंसी मजाक भी किया, जो मुझे बुरा नहीं लगा.
इसी के साथ दोनों ने अपने अपने शादीशुदा सम्बन्धों की बातें शुरू कर दीं. उससे बातें करते करते लगभग 2 बज गए, पर संभोग सम्बन्धी बातें नहीं हुई. क्योंकि न मैं करना चाहती थी, न उसकी हिम्मत हुई.

फिर जब मेरे घर पति आ गए तो उसने फ़ोन करना बंद कर दिया और केवल वॉट्सएप्प पर संदेश भेजता रहा. अगले हफ्ते फिर पति चले गए, तो उस रात भी बहुत सी बातें हुईं और फ़ोन रखने से पहले उसने मेरे और मेरे पति के बीच सम्बन्धों के बारे में पूछने चाहा. पर मैंने जान कर अनजान बनते हुए बात काट दी.

अगले दिन पति आए, लेकिन दूसरे ही दिन फिर से चले गए. सुखबीर हमेशा इस बात पर नजर रख रहा था. दोपहर को उसने फिर फ़ोन किया और कुछ देर बातें की. इस बार मैं पूरी तरह समझ गयी कि क्यों ये मुझसे इतनी नजदीकियां बढ़ा रहा है.
इधर मेरी काम वासना भी इतनी बढ़ती जा रही थी कि मैं सुखबीर के आगे झुकती जा रही थी.

रात में फिर से हमने बातें शुरू की और इस बार उसने अपने और प्रीति की बातें करनी शुरू कर दीं. जैसा मेरा अनुमान था उनके बारे में वही सब सुखबीर ने बताया. पर उसने ये नहीं बताया कि प्रीति के साथ सम्बन्ध ठीक हो रहे हैं और मैंने भी नहीं कुछ पूछा, वरना उसे शक हो जाता.

धीरे-धीरे उसने मेरे जीवन के राज जानने चाहे और फिर मैंने भी उसे अपने पति के साथ सम्बन्धों की बात बता दी. इससे उसका रास्ता साफ हो गया और उसने मेरी सुंदरता के गुण गाने शुरू कर दिए. मैं तो समझ ही गयी थी कि सुखबीर अब मुझे अपनी वासना की जाल में फांसने की चाल चल रहा था. पर मैंने सोचा कि इसे भांप कर देखती हूं कि ये कितनी दूर तक जाता है. मेरे पास अपनी वासना को शांत करने के विकल्प बहुत हैं, पर समय और स्थान का अभाव था. दूसरी तरफ प्रीति मेरी सहेली थी, इस वजह से मेरा सुखबीर के साथ कोई विचार अभी तक नहीं बन सका था.

जबकि सुखबीर ने मुझे ऐसे सुझाव देने शुरू कर दिए थे, जैसे मैं कोई अबला नारी हूँ. उसने नारी के प्रति अपने सामान्य भाव प्रकट करने शुरू कर दिए. उसने मुझे सुझाया के यदि मुझे पति से सुख नहीं मिल रहा, तो तुम किसी अन्य से ये सुख प्राप्त कर सकती हो. इसमें कोई बुराई नहीं है क्योंकि यदि मर्द अगर एक या एक से अधिक औरतों के साथ संभोग कर सकते हैं, तो स्त्री का भी सामान्य अधिकार है.

उसे क्या पता था कि मैं जिन व्यक्तियों के बीच रह कर आई हूं, वो उससे भी कहीं ज्यादा खुले विचारों के हैं. मैं तो उसके स्वार्थ को जान गई थी, पर मुझे केवल प्रीति की चिंता थी. सुखबीर वैसे भी बहुत आकर्षक मर्द था, मुझे उसके साथ कोई आपत्ति नहीं थी, पर केवल प्रीति के लिए मैं उससे दूर रहती थी.

उस रात सुखबीर से बातें करते हुए सुबह के 4 बज गए और हमने लगभग एक दूसरे की पसंद, नापसन्द सब जान लिए. मुझे नींद आने लगी थी और मैंने उससे फ़ोन रखने को कहा. तब उसने खुल कर अपनी बात रख दी.
उसने मुझसे कहा कि क्यों न हम एक दूसरे के काम आएं.
इस पर मैंने बिना कुछ कहे फ़ोन रख दिया और सो गई.

अगले दिन पति का फ़ोन आया और उन्होंने कह दिया कि वो आज भी नहीं आने वाले हैं.
फिर मैंने अपना फ़ोन देखा, तो सुखबीर का माफी मांगने का संदेश था. मैंने उसे कोई उत्तर नहीं दिया.

फिर दिन भर अपनी उसी व्यस्क साइट पर लगी रही और शाम 7 बजे माइक और मुनीर का कैमरा मेरे सामने था. दोनों की कामक्रीड़ा ने मेरी वासना की आग फिर से भड़का दी. मुझे बेचैनी सी होने लगी.

और फिर सोने से पूर्व फिर सुखबीर का संदेश आया. पहले तो मैंने सोचा कि अब सुखबीर से दूरी रखूंगी, पर आधे घंटे तक दिमाग की माथापच्ची के बाद आखिर मैंने उसे फ़ोन किया. वो मेरे ही फ़ोन की प्रतीक्षा कर रहा था. फ़ोन उठाते ही उसने मुझसे अपने कथन के लिए माफी मांगी. मैंने थोड़ा बनते हुए उसे कुछ देर और गिड़गिड़ाने दिया और फिर माफ कर दिया.

फिर हमारी बातें शुरू हुईं और कुछ समय बात करने के लिए वो मुझे फिर से मेरी शारीरिक इच्छाएं पूरी करने पर जोर देने लगा.
उसने मुझे अपने साथ नहीं बल्कि किसी भी अन्य पुरुष, जो मुझे पसंद हो, उसके साथ सम्बन्ध बनाने का सुझाव देने लगा. मैं उसकी बातें सुनती रही और विचार करती रही. मेरे पास अपनी कामाग्नि को शांत करने का ये एक अच्छा अवसर था. केवल अब मैं विचार में डूबी थी कि यदि मैं उसे हां कह देती हूं, तो गोपनीयता कैसे बनी रहेगी. यदि गोपनीयता बनी भी रही, तो सेक्स किस स्थान पर करेंगे. क्योंकि इस शहर में पता नहीं कौन मेरे पति को जानता हो, क्या पता था. भले अभी कोई मुझे न जानता हो, पर अगर बाद में उसी ने मुझे पति के साथ देख लिया, तो शायद पहचान ले.

हम दोनों के घर भी थे, पर आस पास के लोगों को शक हो सकता था कि कोई स्त्री अथवा पुरुष इतनी देर घर के भीतर क्या कर रहा था. किसी की भी नजर पड़ सकती थी. इसलिए मैं उसकी बातें सुनती रही और सोचती रही कि आगे वो क्या कहेगा.

बातों के बढ़ते ही उसने फिर से मुझे अपने प्रति रिझाने के प्रयास शुरू कर दिया और खुद ही उसने कह दिया कि यह बात सिर्फ हम दोनों के बीच ही रहेगी. न मेरे पति को पता चलेगा, न प्रीति को.
मैंने भी सोचा कि डर उसे भी है, इसलिए वो किसी से कुछ नहीं कह सकता और मुझे भी लगा कि उस पर भरोसा किया जा सकता था.

फिर मैंने उससे साफ साफ शब्दों में कह दिया कि ठीक है, मैं तैयार हूं पर कहीं शहर से बाहर व्यवस्था करनी होगी. दूसरा मैंने उसे ये भी साफ कर दिया कि सम्बन्ध सिर्फ शारीरिक हों, न कि भावनात्मक तथा हम सम्बन्ध बना भी लेते हैं, तो वो पहली और अंतिम बार होगा. वो आगे मुझे कभी फिर से बाध्य नहीं करेगा, अगर मेरी इच्छा न हुई तो.

इस पर वो ऐसे मान गया, जैसे उसकी मजबूरी हो. मैं पहले से सारी संभावनाएं बना लेना ठीक समझती हूं ताकि वो बाद में सम्बन्ध बनाने के लिए मेरा भयादोहन न करे.
उसने तब मुझे पूरा आश्वासन दिया और मिलने की जगह सोचने का बोल कर उसने फ़ोन काट दिया.

अगले दिन पति शाम तक आने वाले थे, तो सुखबीर ने मुझे दोपहर फ़ोन कर अपनी योजना बताई. पर मैंने उसे कह दिया कि आज पति शाम तक आ जायेंगे इसलिए किसी और दिन इस पर विचार करेंगे.

मेरी हां सुन सुखबीर पूरी तरह से व्याकुल हो गया, पर इधर पति दोबारा कब जाएंगे, अभी उसका भी कोई ठिकाना नहीं था.

एक हफ्ता बीत गया, पर पति यहीं थे. मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था. पर एक तरफ से ठीक ही था, क्योंकि जब से आए थे, वे अधिकांश समय घर पर ही रहते थे, तो मेरा मन कामवासना की ओर नहीं जाता था.

एक रात वो पीने बैठे थे, तो उन्होंने थोड़ी अधिक पी ली और इस वजह मुझसे और दिनों की अपेक्षा अधिक बातें करने लगे. बातों बातों में उन्होंने बताया कि अब उन्होंने काम देखने के लिए एक आदमी रख लिया, इस वजह से वे घर पर ज्यादा समय रहने लगे. फिर अगले हफ्ते उन्होंने बुधवार के दिन रामगढ़ जाने की बात बताई और कहा कि रात तक आएंगे.

उधर सुखबीर व्याकुल हुआ जा रहा था और उसके संदेशों में ये साफ झलकता था.

दो दिन के बाद मैंने उसे संदेश भेज दिया कि बुधवार को दिन भर के लिए अकेली रहूंगी.
उसने मुझे तुरंत अपनी योजना बता दी. शुरू में तो अटपटा लगा, पर सोचने से सही लगा. उसकी योजना थी कि हम कहीं होटल या घर की जगह ऐसी जगह मिलें, जहां कोई आता जाता न हो. मैं नई थी तो उसी ने जगह का चुनाव किया.

बुधवार के दिन आ गया और पति मेरे सुबह सुबह ही निकल गए. सुखबीर ने उस दिन दुकान नहीं खोली और उसने करीब 11 बजे मुझे स्टेशन के पास मिलने को कहा. मैं घर से निकल कर थोड़ी दूर पैदल चली, फिर ऑटो पकड़ स्टेशन की ओर चल पड़ी.

स्टेशन पहुंचने पर देखा कि सुखबीर अपनी मोटर साईकल पर मेरा इन्तजार कर रहा था. मुझे देख उसके चेहरे पर ऐसी खुशी आयी कि क्या कहूँ.

मैंने साड़ी पहनी थी, तो एक तरफ होकर उसकी मोटर साईकल पर बैठ गयी और उसे एक हाथ से पकड़ लिया. पहली बार मैंने उसे छुआ था और मुझे महसूस हुआ कि मेरे छुअन से उसका शरीर सिहर उठा था. वो एक फौजी आदमी था और मुझे उसका बदन बहुत कठोर लगा.
मैंने सोचा कि ये सरदार व्यवहार से तो बहुत कोमल है और आसानी से वश में आ जाता है, पर जैसा कठोर बदन है, कहीं मुझे अपने वश में न कर ले.

उसने गाड़ी चलाना शुरू किया और एक गली से होता हुआ गाड़ी शहर से बाहर ले आया. उसकी गाड़ी अब उस रास्ते पर थी, जिधर कोयले की खदानें थीं.
मैंने उससे पूछा कि आखिर कहां ले जा रहे हो.
उसने जवाब दिया कि ये जगह ऐसी है, जहां कोई नहीं आता और बिल्कुल सुरक्षित है.

करीब 7-8 किलोमीटर आने के बाद कुछ सरकारी घर दिखने लगे. अधिकांश घर टूटे हुए थे और एक दो घर जर्जर अवस्था में थे. थोड़ी ही दूर में पानी से भरी कोयले की खदान थी, जो बन्द हो चुकी थी.

उसने एक घर के पास ले जाकर गाड़ी रोकी और कहा- यही वो जगह है.
मैं चौंक गयी और कहा- यहां तो कोई भी आ सकता है और अगर किसी ने देख लिया तो मुसीबत हो जाएगी.
उसने कहा- इधर कोई नहीं आता जाता है ये पूरा खंडहर है और ये घर मेरा ही है.

उसने पहले तो एक टूटे घर के भीतर अपनी गाड़ी छिपा दी. फिर जो उसका घर था, वो सही हाल में था. उस पर ताला लगा हुआ था, उसने ताला खोला और मुझे जल्दी से अन्दर आने को कहा. उसने बताया कि उसके पिता पहले यहीं काम करते थे और इसी क्वार्टर में रहते थे. जब खदानें नजदीक आ गईं, तो सबको जाने को कहा गया और दूसरी जगह क्वार्टर दे दिए गए. अब ये सरकारी होने की वजह से इन पर कोई ध्यान नहीं देता है, इसलिए जैसे का तैसा पड़ा हुआ है.

अन्दर पूरा अंधेरा था, तो उसने एक खिड़की खोली, पर जैसे ही धक्का दिया खिड़की का दरवाजा सड़े होने की वजह से एक तरफ से टूट गया. खिड़की से रोशनी आयी, तो पूरा धूल मिट्टी से घर भरा दिखा. कहीं न बैठने की जगह थी, न खड़े होने की और केवल दो ही कमरे थे और दोनों एक जैसे ही थे.

घर में कोई भी सामान नहीं था. फिर उसने एक कोने के पास से एक बड़ी सी गठरी निकाली. मैं समझ गयी कि प्रीति के अलावा ये सरदार और भी बाहर अपनी जुगाड़ भिड़ाता रहता है.. पर मुझे क्या फर्क पड़ता था.

उसने उस गठरी को खोला और एक तरफ बिछा दिया. फिर बाहर जाकर अपनी गाड़ी से एक चादर और एक तौलिया ले कर आया. उसने चादर बिछा कर मुझे बैठने को कहा.

बैठते ही मैंने उससे कहा- आप हमेशा यहीं जुगाड़ लाते हो क्या?
उसने हंसते हुए मुझे सफाई दी- नहीं ये तो दो दिन पहले लाकर रखी है.
मैं हंस पड़ी.

उसने मुझसे कहा- आपके पति कब तक आएंगे?
मैंने कहा- रात तक.. पर मैं शाम होने से पहले वापस जाना चाहती हूँ.
पता नहीं क्यों, मुझे उसके सामने कोई शर्म हया नहीं आ रही थी. इसलिए मैं खुद ही बोल पड़ी- जो भी करना है, जल्दी कर लेते हैं.

इतना कहने की देरी थी कि उसने तुरंत मेरा पल्लू खींच कर नीचे कर दिया और मेरे तने हुए स्तनों को ऐसे देखने लगा जैसे कोई वहशी कुत्ता हो.

पर उसमें इतनी हिम्मत नहीं हो रही थी कि वो खुद कुछ करे बल्कि उसने मुझे डरे हुए शब्दों में ब्लाउज खोलने को कहा. मैंने उसे उत्तर दिया कि इतना सब करने का समय नहीं है, जल्दी से करके यहां से निकलते हैं.

उसने मेरी तरफ बड़ी आशा से देखा.
मैंने उससे पूछा- क्या तुम तैयार हो?
वो कुछ पल के लिए सोच में पड़ गया. फिर अचानक हां बोल सिर हिलाने लगा.

मेरी वैसे इच्छा हुई कि कुछ देर खेलूँ उसके साथ, फिर सोचा कि आज इसे पहले तड़पाती हूँ, फिर बाद में कभी खेल लूंगी.

मैंने उसको अपनी पैंट उतारने को कहा. उसने हड़बड़ाते हुए अपनी पैंट खोली, तो उसके जांघिए के भीतर ही उसका लिंग तनतना रहा था. मैं उसकी व्याकुलता समझ गयी और बोली- तुम पहले मेरी योनि को चाट कर गीला करो.
वो तो जैसे यही चाह ही रहा था. उसने झट से मेरी साड़ी उठा दी तो मैंने उसे डांटते हुए बोला- रुको, हड़बड़ी क्या है.

इस पर वो डर सा गया और रुक गया. मैंने अपनी साड़ी कमर तक पूरी ऊपर की और अपनी पैंटी उतार उसे अपनी योनि के दर्शन करा दिए. उसकी आंखों में तो जैसे खून उतर आया था. उसने बिना देरी किये मेरी जांघों के बीच अपना सिर घुसा अपनी अवस्था ले ली.

उसने मेरी योनि को एक बार नजर भरके देखा, फिर अपना मुँह मेरी योनि से चिपका दिया. उसके मुँह से पहले उसकी मूंछें और दाढ़ी मेरी योनि से छू गईं, जिसकी गुदगुदी से मेरे रोंये खड़े हो गए. मेरी योनि को उसने जीभ से चाटना शुरू कर दिया. कुछ पल के लिए तो मैं थोड़ी सामान्य ही रही, पर 2 मिनट के बाद मुझमें भी खुमारी चढ़ने लगी. मेरी योनि की पंखुड़ियों में सनसनाहट पैदा होने लगी और ऐसा लगने लगा कि कुछ रेंगता हुआ गुदगुदाता हुआ मेरी योनि के भीतर जाने लगा.

कुछ ही पलों में ऐसा लगा, जैसे वो रेंगती हुई चीज मेरी नाभि से जा टकराई. एक बिजली का झटका सा महसूस हुआ और यूं लगा जैसे नाभि से रस की तेज फुहार छूट कर योनि से बाहर निकलने को है. मैंने सुखबीर की पगड़ी पकड़ ली और उसे अपनी योनि में खींचने लगी. मैं बहुत दिनों से प्यासी थी, शायद इसी वजह से मुझे लगा कि मैं जल्दी ही उत्तेजित हो गयी. मेरी योनि पल भर में गीली होकर लबालब हो गयी.

कुछ देर उसने और योनि चाटी, तो मैं खुद बोल पड़ी- योनि के भीतर जीभ डाल कर चूसिये न सुखबीर जी.
वो मेरी आज्ञा का पालन तुरंत करने लगा और थोड़ी देर चाटने के बाद मुझे लगने लगा कि अब मैं खुद को रोक नहीं सकती.
मैंने सुखबीर से कहा- अब बस भी करो.. अब मेरी बारी है.
सुखबीर यह सुन कर ख़ुशी से झूम उठा. शायद पहली बार उससे किसी औरत ने ये सब कहा होगा.

मैंने उसके खड़े होने को कहा. उसका पैंट तो पहले से पैरों में गिरा हुआ था, केवल जांघिया बचा था.
उसने जैसे ही अपनी जांघिया नीचे सरकाया, उसका लिंग टन्न से झूले की तरह ऊपर नीचे होने लगा. वो तो पहले से ही इतना उत्तेजित था कि कुछ करने की जरूरत नहीं थी.

सरदार जी का लिंग गोरा और बहुत कड़क दिख रहा था. लिंग बालों से घिरा हुआ था और अंडे फूल और सिकुड़ रहे थे, मानो जैसे वीर्य का दरिया उसके अंडकोषों में उथल पुथल होते हुए बहने को हो रहा था. उसके अंडकोष किसी सांड की तरह लटक रहे थे और लिंग, कोई हलचल मचाने को फनफना रहा था. उसके लिंग का आकार मेरे अपेक्षा के अनुसार बढ़िया दिख रहा था, मोटाई और लंबाई बिलकुल सही थी.

मैंने उसके लिंग को पकड़ हाथ से आगे पीछे हिलाया, तो सुखबीर लंबी लंबी सांसें लेते हुए सिसकारने लगा. जैसे ही मैंने उसके ऊपर की चमड़ी को खींच कर पीछे किया, सुपारा खुल गया. उसकी सुर्ख गुलाबी सुपारे से अंदाज लग गया कि वो पहले से ही अत्यधिक उत्तेजित था. उसके लिंग को पकड़ और सुपारे को देख मैंने अंदाज लगा लिया कि उसकी अधिकतर जवानी हस्तमैथुन करते गुजरी थी. उसने संभोग कम किया था. मैंने उसके सुपारे पे अपनी जुबान फिराई, तो उसने सट से मेरे सिर को पकड़ बालों को कस के दबोच लिया. थोड़ा थूक से गीला करके मैंने लिंग मुँह में भर उसे जैसे ही चूसना शुरू किया. उसने तो ऐसे सिसकारी भरनी शुरू कर दी, जैसे कोई औरत हो.

मैंने उसे अभी एक मिनट भी नहीं चूसा था कि उसने जबरदस्ती मेरे मुँह से लिंग खींच कर बाहर निकालने का बोलने लगा- बस करो.. नहीं तो मेरा रस निकल जाएगा.
मुझे शंका हुई कि वो ज्यादा देर संभोग नहीं कर पाएगा. फिर भी मैंने सोचा अब इतना हो चुका है, तो आगे बढ़ कर ही देखा जाए.
मैं लेट गयी और अपनी टांगें खोल कर घुटनों को मोड़ते हुए उससे बोली- आ जाओ.

उसने अपनी पैंट और जांघिया को पूरा निकाला और मेरे ऊपर आ गया. वो मेरे ऊपर झुक गया और उसका लिंग ठीक मेरी योनि के ऊपर था.
वो मुझे देखने लगा, तो मुझे ही कहना पड़ा- अब घुसाओ भी.

वो एक हाथ से पकड़ कर अपना लिंग मेरी योनि की छेद में घुसाने लगा. उसका सुपारा घुसा, तो मुझे लगा जैसे कोई गर्म गोला मेरी योनि में घुस गया. बड़ा आनन्द सा महसूस हुआ, मुझे ऐसा लगा जैसे कोई गुदगुदी कर रहा हो. उसने धीरे धीरे दबाव देना शुरू किया. मेरी योनि इतनी गीली थी कि उसका लिंग सरकता हुआ कुछ पल में ही भीतर समा गया.

मैंने उससे कहा- आराम से धीरे धीरे धक्के मारना.
उसने मेरी आज्ञा का पालन करते हुए हां में सिर हिला हल्के हल्के धक्के मारने शुरू किए. उसका लिंग चिकनी मिट्टी सी मेरी योनि में, आराम से फिसल कर अन्दर बाहर होने लगा. मुझे बहुत आनन्द आने लगा था और मैं मस्ती में आंखें मूंदे उसके धक्कों को स्वीकृति देती रही.

वो भी मेरे साथ आनन्द के सागर में गोते लगाने लगा था. हम दोनों की लम्बी लम्बी सांसें, एक साथ कराहते सिसकते हुए कमर से कमर टकराने लगीं. उसके लिंग में अजीब सा आकर्षण था, जो मुझे और अधिक उत्तेजित कर रहा था. मुझे ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे मेरी योनि की पूरी मांसपेशियां सिकुड़ कर उसके लिंग को भींच रही थी.

मेरी सेक्स कथा पर आप मुझे अपने विचार मेल कर सकते हैं.
[email protected]
कहानी जारी है.

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